खाद्य श्रृंखला (Food Chain)। खाद्य जाल (Food Web)।

Zyan Ki Bate
0

आज के इस लेख में हम पारिस्थितिक तंत्र के अंतर्गत खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के बारे में जानेंगे।

तो आइये जानते है........

खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के बारे में जानने से पहले हमें पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के बारे में जानना आवश्यक है। खासतौर से पारिस्थितिक तंत्र के बारे में तो जानना बहुत ही आवश्यक है। अगर आप पारिस्थितिक तंत्र को समझ गए तो खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल को समझने में बहुत आसानी होगी। तो आइये क्रमशः समझते हुए आगे बढ़ते है।

पर्यावरण (Environment)।

पर्यावरण

हमारे आसपास या चारों तरफ मौजूद समस्त चीजें जिनसे हम घिरे हुए है, यही समस्त चीजें मिलकर पर्यावरण का निर्माण करती है। जैसे- हमारा घर, दुकान, बाग, बगीचे, मैदान, पठार, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, महासागर, हवा, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, पौधे, जीव-जंतु आदि। पर्यावरण में ही सब कुछ निहित है। पारिस्थितिक तंत्र पर्यावरण का ही हिस्सा है। समस्त सजीव प्राणी जीवित रहने के लिए पर्यावरण पर निर्भर है।

 पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem)।

प्रकृति में जैविक और अजैविक घटकों के आपस में क्रिया के फलस्वरूप एक तंत्र का निर्माण होता है जिसे पारितंत्र (Ecosystem) या पारिस्थितिक तंत्र (Ecological System) कहते है। जैविक घटक और अजैविक घटक की आपस में क्रिया को ऐसे समझे कि समस्त सजीव प्राणी जीवित रहने के लिए अपना भोजन और ऑक्सीजन पर्यावरण से प्राप्त करते है। पेड़ का उदाहरण ले तो पेड़, सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते है। तो यहाँ पर पेड़ जैविक घटक हुआ और सूर्य का प्रकाश अजैविक घटक।

पारिस्थितिक तंत्र

पारिस्थितिक तंत्र में जैविक और अजैविक घटकों की क्रिया को हम एक अच्छे उदाहरण के माध्यम से समझते है।

पारिस्थितिक तंत्र में जैविक और अजैविक घटकों की आपसी क्रिया का तालाब एक अच्छा उदाहरण है, तो आइये इसको समझते है। किसी भी तालाब की तीन सतहें होती है। ऊपरी, मध्य व निचली सतह। तीनों सतहों में ऑक्सीजन, तापमान, प्रकाश की स्थिति तथा इनमें रहने वाले जैविक घटकों को प्रभावित करने वाले कारकों के आधार पर काफी अंतर होता है। यदि आपने कभी तालाब में डुबकी लगाई होगी तो जरूर महसूस किया होगा कि जल की ऊपरी और निचली सतह के तापमान में अंतर रहता है। 

मान लीजिए एक तालाब है, तो तालाब का पानी, पानी में घुली हुई ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड, मिट्टी, पत्थर, खनिज आदि ये अजैविक घटक है, वही तालाब में रहने वाले छोटे से लेकर बड़े तक पौधों एवम जंतुओं की समस्त प्रजातियां जैविक घटक के अंतर्गत आती है। जिस तालाब में जितनी अधिक प्रजातियां होगी वह तालाब उतना ही सशक्त और स्वस्थ पारिस्थिक तंत्र होगा।

तालाब में ही विभिन्न जीव जन्म लेते है, सांस लेते है, जीते है, पोषण लेते है व उत्सर्जन करते है, भ्रमण, विकास व जनन करते है, दूसरों जीवों को अपना भोजन बनाते है और फिर दूसरे जीव का भोजन बन जाते है और इसी तालाब में मर भी जाते है। तो यहाँ पर आप ये समझ गए होंगे कि कैसे जैविक और अजैविक घटक आपस में क्रिया करके एक तंत्र का निर्माण किए। इसी प्रकार के तंत्रों को पारिस्थितिक तंत्र कहते है।

पारिस्थितिक तंत्र प्राकृतिक भी होते है और मानव निर्मित भी। प्रकृति ने जो बनाए है वो प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र कहलाते है। ये दो प्रकार के होते है स्थलीय और जलीय। जैसे- वन, जंगल, मरुस्थल, स्थलीय और सागर, नदियाँ, महासागर ये जलीय। वही बगीचे, खेल के मैदान, मानव निर्मित तालाब आदि ये मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र है। सरल शब्दों में इसको ऐसे समझे कि एक क्षेत्र विशेष जहाँ जैविक और अजैविक घटक आपस में क्रिया करके जीवन संभव बनाए हुए है उसे पारितंत्र या पारिस्थितिक तंत्र कहते है।

खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल समझने से पहले पारिस्थितिक तंत्र को समझना इसलिए जरुरी है, क्योंकि एक पारिस्थितिक तंत्र के अंदर ही खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का निर्माण होता है। पारिस्थितिक तंत्र तो समझ गए, आइये अब खाद्य श्रृंखला को समझते है और उसके बाद खाद्य जाल को। पारिस्थितिक तंत्र समझ लिए है तो खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल समझने में आसानी होगी।

खाद्य श्रृंखला (Food Chain)।

जब आप एक पारिस्थितिक तंत्र देखेंगे तो पायेंगे कि एक जीव दूसरे जीव को खाने तथा दूसरे जीव द्वारा खाए जाने कि एक श्रृंखला बनाते है। या फिर ऐसा कहे कि खाद्य श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवधारियों का एक क्रम है जिसके माध्यम से पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य ऊर्जा का प्रवाह होता है। जैसे- पेड़-पौधे भोजन का निर्माण करते है फिर इन पेड़-पौधों को प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी) और प्राथमिक उपभोक्ता को द्वितीयक उपभोक्ता और द्वितीयक उपभोक्ता को तृतीयक उपभोक्ता भोजन के रूप में उपयोग करते है। 

तालाब एक पारिस्थितिक तंत्र।
तालाब एक पारिस्थितिक तंत्र।

जैसे- ऊपर का चित्र तालाब के पारिस्थितिक तंत्र का है। चित्र में देखिये छोटी मछलियां, फाइटोप्लैंकटन (अति सूक्ष्म पादप) जो उत्पादक की श्रेणी में आते है, उन्हें खाती है फिर इन छोटी मछलियों को बड़ी मछलियां खाती है और इन बड़ी मछलियों को मगरमच्छ खाते है। इस प्रकार से आप देखेंगे कि एक श्रृंखला का निर्माण हो रहा है। इस प्रकार की श्रृंखलाओं को ही खाद्य श्रृंखला कहते है। मतलब एक खाद्य श्रृंखला के अंतर्गत हर बड़ा जीव अपने से छोटे जीव को खाता है और यही प्रक्रिया क्रमशः चलती रहती है।

पोषण स्तर (Nutritional Level)।

तालाब एक साधारण खाद्य श्रृंखला का उदाहरण है। साधारण खाद्य श्रृंखला में सामान्यतः उत्पादक, शाकाहारी और मांसाहारी होते है। ठीक तालाब की भांति स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र में साधारण खाद्य श्रृंखला की बात करे तो घास, पेड़-पौधे तथा झाड़िया उत्पादक, घास, पेड़-पौधे और झाड़ियों को खाने वाला हिरण शाकाहारी तथा हिरण को खाने वाला शेर मांसाहारी की श्रेणी में आता है। 

खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक कड़ी अगले स्तर के लिए पोषण है और इसे ही पोषण स्तर कहते है। यहाँ पर पोषण स्तर की बात करे तो उत्पादक घास, पेड़-पौधे तथा झाड़िया प्राथमिक पोषण स्तर है। पेड़ तथा झाड़ियों को खाने वाला हिरण द्वितीय पोषण स्तर है और हिरण को खाने वाला शेर तृतीय पोषण स्तर में आता है। किसी भी पारिस्थितिक तंत्र में अनेक प्रकार की खाद्य श्रृंखलाएं होती है। अनेक प्रकार की खाद्य श्रृंखलाएं, खाद्य जाल का निर्माण करती है।

खाद्य श्रृंखला के पहले स्तर पर उत्पादक हरे पेड़-पौधे और अंतिम स्तर पर अपघटक होते है। इन दोनों के बीच कई स्तर के उपभोक्ता होते है। खाद्य श्रृंखला का प्रत्येक स्तर पोषण स्तर या ऊर्जा स्तर कहलाता है। ऊर्जा स्तर की बात करे तो प्रारम्भ से लेकर अंतिम तक प्रत्येक स्तर में निरंतर ऊर्जा स्तर में कमी होती जाती है। इसलिए खाद्य श्रृंखला जितनी छोटी होगी उतनी ही ज्यादा ऊर्जा उत्पादक से होते हुए उपभोक्ता में पहुंचेगी। 

नीचे हम आपको दो खाद्य श्रृंखलाएं दिखा रहे है आप खुद महसूस करियेगा कि किसमें ऊर्जा स्तर ज्यादा अच्छा होगा। 

घास स्थल के पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला में पेड़-पौधे (उत्पादक), प्राथमिक उपभोक्ता हिरण (शाकाहारी), तथा द्वितीयक उपभोक्ता शेर (मांसाहारी) निम्नानुसार आएंगे। इसमें तीन पोषण स्तर (ऊर्जा स्तर) बन रहे है। 

स्थलीय खाद्य श्रृंखला।
स्थलीय खाद्य श्रृंखला।

समुंद्रीय पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला में घास (उत्पादक), कीट प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी), मेढ़क द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी), सांप तृतीयक उपभोक्ता (मांसाहारी) तथा अंतिम में बाज अपघटक के रूप में आता है। इसमें पांच पोषण स्तर (ऊर्जा स्तर) बन रहे है। आप समझ गए होंगे कि किस खाद्य श्रृंखला का ऊर्जा स्तर ज्यादा अच्छा है। 

समुद्रीय खाद्य श्रृंखला।

खाद्य श्रृंखलाएं (Food Chains)।

  • घास→चूहा→बाज 
  • घास→चूहाु→सांप→बाज 
  • घास→टिड्डा→छिपकली→बाज 
  • घास→टिड्डा→बाज 
  • घास→खरगोश→बाज
  • घास→खरगोश→भेड़िया→चीता
  • घास→तिलचट्टा→मेढ़क→सांप→बाज  

खाद्य जाल (Food Web)। 

ऊपर की खाद्य श्रृंखलाएं देखेंगे तो आप पाएंगे कि अधिकांश जीव एक से अधिक खाद्य श्रृंखलाओं में शामिल है। तथा अपना भोजन व ऊर्जा की पूर्ति करने के लिए कई प्रकार का भोजन करते है। पारिस्थितिक तंत्र में कई श्रृंखलाओं के आपस में आड़ा-तिरक्षा जुड़ने से एक जालनुमा संरचना का निर्माण होता है, जिसे खाद्य जाल कहते है। खाद्य जाल एक खाद्य श्रृंखला के जीव का दूसरी खाद्य श्रृंखला के जीव के बीच सम्बन्ध को दर्शाता है।

खाद्य जाल को हम खाद्य श्रृंखलाओं के उदाहरण के माध्यम से बेहतर तरीके से समझ पाएंगे, तो ऊपर जो खाद्य श्रृंखलाएं दी गयी है उन्हें ध्यान से देखिये। पहली श्रृंखला में घास को चूहा खाता है फिर चूहे को बाज खा जाता है। दूसरी श्रृंखला में देखिये पहले घास को चूहा खाता है फिर चूहे को सांप खाता है और फिर सांप को बाज खा जाता है। इसी प्रकार से आप अन्य श्रृंखलाओं को भी देखेंगे तो पाएंगे कि अधिकांश जीव एक से अधिक खाद्य श्रृंखलाओं में शामिल है तथा अपने भोजन व ऊर्जा की पूर्ति के लिए कई प्रकार का भोजन करते है। इस प्रकार से जीवों का कई श्रृंखलाओं से जुड़ने से जालनुमा संरचना का निर्माण होता है जिसे खाद्य जाल कहा जाता है। 

एक अन्य चित्रात्मक उदाहरण देखते है।

  • घास→चूहा→बाज 
  • घास→चूहाु→सांप→बाज
  • घास→खरगोश→बाज
  • घास→टिड्डा→चिड़िया→बाज
  • घास→चिड़िया→बाज
  • घास→टिड्डा→मेढ़क→बाज
  • घास→टिड्डा→मेढ़क→सांप→बाज
  • घास→खरगोश→लोमड़ी→बाज 
    खाद्य जाल।

खाद्य श्रृंखला व खाद्य जाल का महत्व (Importance of Food Chain and Food Web)।

  • खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल की वजह से हमारे पर्यावरण और पृथ्वी पर संतुलन बना हुआ है।
  • इन्ही की मदद से ऊर्जा का प्रवाह निरंतर जारी है। 
  • ये उत्पादक से उपभोक्ता तथा अपघटक के बीच की कड़ी को जोड़े हुए है।
  • खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के माध्यम से जीवों के बीच खाने के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है। 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)