आहार श्रृंखला (Food Chain)। पोषण स्तर (Nutritional Level।

Zyan Ki Bate
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आज के इस लेख में हम आहार श्रृंखला और आहार श्रृंखला में पोषण स्तर के बारें में जानेंगे।

तो आइये जानते है.......

आहार श्रृंखला (Food Chain)।


पूरे पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का जो मुख्य स्त्रोत है वह सूरज (सूर्य) है। सूर्य से ही स्थानांतरित हुई ऊर्जा सबको मिलती है। किसी भी पारिस्थितिक तंत्र में पेड़ पौधों से लेकर जीवधारियों तक के बीच का वह क्रम जिसके माध्यम से ऊर्जा का स्थानान्तरण पेड़ पौधों से शुरू होकर अपघटकों तक पहुँचता है उसे आहार श्रृंखला कहते है। जिस बिंदु या स्तर पर एक जीव से दूसरे जीव में पोषण के माध्यम से ऊर्जा का स्थानांतरण होता है उसे पोषण स्तर कहते है।

विभिन्न क्रमिक पोषण स्तरों की संयुक्त श्रृंखला से आहार श्रृंखला का निर्माण होता है। किसी-किसी पारिस्थितिक तंत्र में एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में ऊर्जा का स्थानान्तरण अति जटिल श्रृंखलाओं के माध्यम से होता है। इन अति जटिल श्रृंखलाओं से आहारजाल का निर्माण होता है। ऐसे समझे कि जब एक जीव कई जीवों को खाता है तो इस स्थिति में कई आहार श्रृंखलाएं बन जाती है। जिससे जालनुमा संरचना का निर्माण होता है और इसे ही आहारजाल कहा जाता है।

आहार श्रृंखला में पोषण स्तर। Nutritional Level in the Food Chain

जिस बिंदु या स्तर पर एक जीव से दूसरे जीव में पोषण के माध्यम से ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, उसे पोषण स्तर कहते है। इसके मुख्यतः तीन घटक होते है।

  • उत्पादक (Producer)
  • उपभोक्ता (Consumer) 
  • अपघटक (Decomposer)

आहार श्रृंखला में प्रथम पोषण स्तर स्वपोषित जीवों का होता है जिन्हे उत्पादक कहा जाता है, ये अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा स्वयं बना लेते है। इसके बाद उपभोक्ता श्रेणी शुरू होती है, इसमें प्राथमिक उपभोक्ता शाकाहारी होते है जो द्वितीय पोषण स्तर में आते है। इसके बाद तृतीय पोषण स्तर में मांसाहारी जीव आते है तथा चौथे पोषण स्तर में अपघटक आते है जो मरे हुए जीवों को खाते है। मनुष्य सर्वाहारी होता है यह द्वितीय और तृतीय दोनों पोषण स्तर में आता है।  

उत्पादक (Producer)। 

सभी उत्पादक प्रथम पोषण स्तर में आते है, ये स्वपोषी होते है, क्योंकि ये अपना भोजन खुद बना लेते है, ये सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पानी और वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन खुद बना लेते है। इस क्रिया के दौरान पेड़-पौधे ऑक्सीजन बाहर निकालते है। उत्पादक की श्रेणी में गेंहूँ, चावल, आम का पेड़, पीपल का पेड़ आदि समस्त पेड़-पौधे आते है।

उपभोक्ता (Consumer)।

समस्त उपभोक्ता परपोषी श्रेणी में आते है क्योंकि ये अपना भोजन खुद नहीं बनाते ये अपने भोजन के लिए पेड़-पौधों या अन्य जीवों पर निर्भर रहते है इसके अंतर्गत वो सभी सजीव प्राणी आते है जो अपने भोजन के लिए पेड़-पौधों या अन्य जीवों पर निर्भर रहते है ये पेड़-पौधों द्वारा तैयार भोजन या अन्य जीवों का उपभोग करते है इसलिए इन्हे उपभोक्ता कहा जाता है उपभोक्ता को मुख्यतः तीन श्रेणियों में रखा गया है

  1. प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumer)
  2. द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumer)
  3. तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumer)

प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी)। Primary Consumer (Vegetarian)

वो समस्त जीव-प्राणी जो शाकाहारी होते है, प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में आते है। ये अपने भोजन के लिए उत्पादक अर्थात पेड़-पौधों पर निर्भर रहते है। मतलब ये घास, फसल, अनाज, बाग़-बगीचे, पेड़--पौधों की पत्तिया, छोटे-छोटे पौधों को खाकर अपना जीवन व्यतीत करते है। जैसे- भैंस, गाय, बकरी, घोड़ा, हिरण, ऊँट, खरगोश, टिड्डा, हाथी, जिराफ, गधा आदि।

द्वितीयक उपभोक्ता। Secondary Consumer 

ऐसे समस्त जीव जो अपने भोजन के लिए प्राथमिक उपभोक्ता यानि शाकाहारी जीवों पर निर्भर रहते है, उन्हें द्वितीयक उपभोक्ता कहा जाता है। ये मांसाहारी श्रेणी में आते है। जैसे- मेढ़क, छिपकली, लोमड़ी, शेर आदि।

तृतीयक उपभोक्ता। Tertiary Consumer

इस श्रेणी में भी मांसाहारी ही आते है। इस श्रेणी के उपभोक्ता अपने भोजन के लिए मांसाहारी जीव या द्वितीयक उपभोक्ता पर निर्भर रहते है। जैसे- सांप, गिद्ध, चील, बाज, शेर आदि।

पारीरस्थितिक तंत्र में कुछ ऐसे जीव होते है जो अपने भोजन के लिए उत्पादक, प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी), मांसाहारी सभी जीवों पर निर्भर रहते है उन्हें सर्वाहारी या सर्वभक्षी कहा जाता है। जैसे कुत्ता, बिल्ली, भालू आदि। मनुष्य भी इसी श्रेणी में आता है ये सर्वाहारी जीव गेंहूँ, चावल, खाने के साथ मांस भी खाते है इसलिए इन्हे सर्वाहारी कहा जाता है  

अपघटक (Decomposer)। 

इसके अंतर्गत सूक्ष्मजीव आते है। जैसे- कवक जीवाणु, कीट, घुन, दीमक आदि। ये सूक्ष्मजीव विभिन्न श्रेणी के जीवों (पौधों और जंतुओं) के मृत शरीर में उपस्थित जटिल कार्बनिक यौगिकों को सरल यौगिकों में विघटित कर देते है, जिससे सरल यौगिक भूमि में पहुंचकर पुनः पौधों के उपयोग के लिए उपलब्ध हो जाते है। इस प्रकार से यह ऊर्जा स्थानान्तरण का चक्र चलता रहता है। ये सूक्ष्मजीव अपने भोजन के लिए मृत जीवों पर निर्भर रहते है इसलिए इन्हे मृतोपजीवी कहा जाता है। 

नोट:- कौआ, चील, बाज, गिद्ध इन्हे भी अपघटक माना जाता हैक्योंकि ये भी मरे हुए जीवों को खाते है और मरे हुए जीव इनका मुख्य भोजन हैं। 

 

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